लेखक- ओम लवानिया

तेईस वर्ष के लंबे करियर के बावजूद स्थिरता नहीं है। बीते कुछ पॉडकास्ट इंटरव्यूज़ में विनीत ने काम की कमी को लेकर खुलकर बात की और कहा कि बॉलीवुड में इतना लंबा समय बिता दिया है लेकिन इस शहर में मेरा अपना घर नहीं है।

इसलिए छावा के कवि कलश की पंक्तियां, “हम नमक है महाराज” सटीक बैठती है कि बॉलीवुड ने विनीत को नमक यानी आउट साइडर ही रखा है। ठीक से अपनाया नहीं है, तिस पर इन्हें जब भी मौका मिला है तो अपने किरदार को बढ़िया से स्टेबल करके निकले है।

करियर को देखें तो कुछ वेब सीरीज और फ़िल्म सोलो लगी है बाक़ी सपोर्टिंग किरदार किए है।

विनीत ने अपने अभिनय से कई किरदार को बहुत बड़ा किया है, हालिया छावा के कवि कलश को ही देख लें। क्लाइमेक्स को इतना मार्मिक कर बैठे है कि क्या ही कहे, विकी और विनीत की जुगलबंदी देखते बनती है, आँखें नम भी होती है गौरवान्वित भी, कि वीर सपूतों के चेहरे पर कोई शिकन न थी। औरंगज़ेब की यातनाओं के आगे झुके नहीं, डटे रहे। अद्भुत सिनेमाई अनुभव दिया है।

बॉलीवुड में ऐसे ही प्रतिभा को दबाया, कुचला जाता है। न जाने कितने ही कलाकार गुमनामी में चले है क्योंकि उन्हें उचित मौके नहीं मिले।

हो सकता है दिनेश विजन के विजन में आगे भी बैठ जायें।

(लेखक फिल्म समीक्षक हैं)

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