लेखक~डॉ.के. विक्रम राव
♂️÷ऐतिहासिक तीन मूर्ति भवन कल (14 अप्रेल 2022) से राष्ट्र का हो गया। केवल नेहरु कुटुम्ब की धरोहर थी। अब 14 अन्य प्रधानमंत्री भी इस साढ़े दस हजार वर्ग मीटर वाली, चार सौ करोड़ लागत की इमारत के अतिरिक्त बटाईदार बन गये हैं।
इनमें एक प्रधानमंत्री थे जो बचपन में गंगा तैर कर स्कूल जाते थे क्योंकि मल्लाह को भाड़े की रकम देने के दो पैसा उनके पास नहीं होते थे। नाम था लाल बहादुर शास्त्री। जिनका चर्खा यहीं रखा है। ललिता जी के मैके से दहेज में मिला था। इस सूची में दो वे प्रधानमंत्री हैं जिनका कोई भी निजी मकान देश में था ही नहीं। किरायेदारों ने तंग आकर उनका समान फिकवा दिया था। नाम था मोरारजी देसाई (मुम्बई) और गुलजारी लाल नन्दा (अहमदाबाद)। तीन खेतिहरों को नाम भी शामिल है : एचडी देवेगौड़ा, चरण सिंह और चन्दशेखर सिंह।
अब ऐसा ही सामान्य व्यक्ति अगला होगा नरेन्द्र दामोदरदास मोदी, निवर्तमान होने के बाद। कल के उद्घाटन समारोह में नेहरु के नाती की बहू (सोनिया) और सरदार मनमोहन सिंह नहीं थे। पता नहीं क्या कारण रहा? कदाचित मलाल रहा होगा। बेदखली का।
स्वाधीनता संघर्ष के दौरान सेवाग्राम की झोपड़ी से राष्ट्रीय जनांदोलन का संचालन करने वाले बापू का सपना था। स्वाधीन गणराज्य में सादगी ही जनजीवन का आधारभूत नियम होगा। बिना आडंबर का जीवन। मितव्ययी जीवनशैली। जैसी कभी जेपी लोहिया के लोग वेतनमान पर नारे बुलन्द करते थे : ”सौ से कम न हजार से ज्यादा।” पर ऐसा हुआ नहीं। गोरे सामन्त गये तो काले श्रीमंत पनप गये। गांधीवाद अब अजायबघर की वस्तु बन गयी। मगर अपवाद भी हुए। यूपी के जालिम गवर्नर सर मारिस हैलेट के जाने के बाद पहली भारतीय राज्यपाल सरोजिनी नायडू लखनऊ राजभवन में सफाई हेतु झाड़ू तक लगा देतीं थीं। सेवाग्राम की आदत जो पड़ी थी।
अब लौटें तीन मूर्ति पर। यहां ब्रिटिश फौज का सेनाध्यक्ष सर क्लाड आचिनलेक रहता था। बन्दूक की नोक पर आचिनलेक वायसराय वेवल की सत्ता संजोता था। इसी फ्लैगस्टाफ हाउस से उसके इशारे पर भारतीय फौज (सिख, राजपूत, जाट, मराठा, आदि टुकड़ियां मिलकर) आजमगढ़, बागी बलिया और पूर्वांचल के अन्य गांवों में 1942 में लाशें गिराते थे। मगर भला कि अब हुआ इस ब्रिटिश सेनाध्यक्ष के दौर के जुल्मों के निशान तीन मूर्ति में नहीं रखे गये। वर्ना वह जलियांवाला बाग से समता कर प्रतिस्पर्धी बन जाता। यहां नेहरु, अपनी पुत्री तथा दोनों नातियों के साथ, सोलह साल रहे। दामाद फिरोज गांधी सांसद आवास में एकाकी जीवन गुजारता था। बस तीन मूर्ति से पांच किलोमीटर दूर पर।
आजादी मिलते ही कांग्रेस सरकार ने ब्रिटिश सेनापति आचिन लेक से यह विशाल भवन खाली करवाया था। उन्हें छोटा आवास आवंटित किया गया। कारण बताते है कि ब्रिटेन में छात्र जीवन में नेहरु अक्सर लंदन के 10 डाउनिंग स्ट्रीट को निहारते थे। यह सौ कमरेवाला तिमंजिला, तीन सदी पुराना ब्रिटिश प्रधानमंत्री का अधिकृत आवास उन्हें बड़ा लुभावना लगता था। यहां पर विंस्टन चर्चिल रहते थे। उनकी कामना थी कि पूना पैक्ट के विरोध में यरवड़ा जेल में आमरण अनशन पर रहे बापू मर जायें। वजह थी कि डा. भीमराव अंबेडकर की मांग थी कि भारतीय मतदाता तीन भागों में बांटे जाये। सवर्ण हिन्दू, मुसलमान तथा दलित। बापू की जिद थी कि हिन्दू समाज अविभाजित है, नहीं बटेगा। अंतत: उनकी जीत हुयी। पूना पैक्ट खारिज हो गया। इसी बुलडाग शक्लवाले चर्चिल ने बापू को ”अंधनंगा फकीर” कहा था। गांधी सदैव इस वायसराय भवन (आज का विशाल राष्ट्रपति भवन) और फ्लैगस्टाफ हाउस (तीनमूर्ति) से दूर ही रहे।
तीन मूर्ति की वैभवता और फिजूलखर्ची के परिवेश में एक दृश्य का उल्लेख कर दूं। मेरा शैशव सेवाग्राम में बीता। वहां हर बड़े आगंतुक से बापू पहले संडास साफ करना और फर्श बुहारना कराते थे। घमण्ड टूट जाता था। कोई भी काम छोटा नहीं होता। इसकी प्रतीति सबको बापू ने ही करायी जो आजाद भारत से मुख्यमंत्री, राज्यपाल केन्द्रीय मंत्री, आला हुक्मरान बने। मगर वे सब बदले—बदले से रहे। तीन मूर्ति भवन में सोलह साल वास करना गरीब भारत में शर्मनाक मानसिकता बन गयी थी। किस्सा है सोवियत कम्युनिस्ट राष्ट्रपति लिओनिद ब्रस्नेव अपनी नब्बे वर्षीय मां को अपने सागरतटीय डाचा (भव्य कमरोंवाला आवास) में ले गये थे। लेनिन की साम्यवादी क्रांति की मां साक्षी रही। उन्होंने बेटे को सचेत किया कि : ”संभल कर रहना, यह लेनिनवादी आकर, तुम्हारे घर को हथिया कर एक ही कमरा छोड़ेंगे। बाकी सब में गरीबों को बसा देंगे।” आजादी के बाद भारत में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। लोग अपने जननायक स्वाधीनता सेनानी हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री के नये आवास विशाल तीनमूर्ति को देख चुके थे। अत: जब नरेन्द्र मोदी के स्मृतिचिन्ह रखे जायेंगे तो दर्शक याद करेंगे कि वडनगर में चाय बेचनेवाला, दिल्ली के अशोक मार्ग में भाजपा कार्यालय में झाड़ू लगानेवाला, स्वयं अपने कपड़े धोनेवाला नरेन्द्र अंतत: तीन मूर्ति की विशालता में समाहित हो गया। देर से सही। बाकी प्रधानमंत्री की पंक्ति में शामिल हो गया। नयी मूल्य व्यवस्था के मानकों के सृजक के रोल में।
मुझे भी तब याद आयेगा कि कैसे एक 25—वर्षीय गबरू स्वयं सेवक बडौदा जेल में मेरी तन्हा कोठरी में हाकर बन कर दैनिक समाचारपत्र भेजवाता था। कल्पनातीत नजारा है, मीठा भी। सिहरनभरी!

÷लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट व वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार हैं÷






















